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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश, बढ़ सकती हैं मुश्किलें

  शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ एफआईआर का आदेश हुआ है। प्रयागराज में पॉक्सो एक्ट की विशेष अदालत ने झूंसी थाना प्रभारी को बच्च...

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शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ एफआईआर का आदेश हुआ है। प्रयागराज में पॉक्सो एक्ट की विशेष अदालत ने झूंसी थाना प्रभारी को बच्चों के यौन शोषण के मामले में अविमुक्तेश्वरानंद, मुकुंदानंद ब्रह्मचारी व अन्य के खिलाफ संबंधित प्रावधानों के तहत तुरंत एफआईआर दर्ज करने और सख्ती के साथ तेजी से जांच करने का निर्देश दिया है। अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ अदालत के आदेश के पालन में प्रयागराज के पुलिस कमिश्नर की ओर से एक रिपोर्ट दाखिल की गई थी। इस रिपोर्ट में शंकराचार्य के खिलाफ गंभीर आरोप है।

पुलिस की इस रिपोर्ट से पता चलता है कि जांच के दौरान, स्वतंत्र गवाहों के साथ पीड़ितों ने भी अपने मौखिक, लिखित और ऑडियो-वीडियो बयानों में गंभीर तरह के संज्ञेय अपराधों के होने का साफतौर पर आरोप लगाया है। रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि अपराध के समय पीड़ित ए की उम्र लगभग 14 साल और पीड़ित बी की उम्र लगभग 17 साल और 6 महीने थी, जिससे पॉक्सो एक्ट 2012 के नियम लागू होते हैं।

थाना प्रभारी को दी गई तहरीर, पीड़ित ए और पीड़ित बी के बयान, गवाहों के बयान, प्रयागराज के एडिशनल पुलिस कमिश्नर की जांच रिपोर्ट और जांच के दौरान इकट्ठा किए गए मटीरियल पर कुल मिलाकर विचार करने के बाद आरोपों में गंभीर और खासतौर पर गंभीर यौन शोषण के आरोप सामने आए हैं, जो पहली नज़र में पॉक्सो एक्ट 2012 और भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत सज़ा देने लायक संज्ञेय अपराध हैं।

यह भी सामने आया है कि आरोपों में पीड़ितों और आरोपियों की मेडिकल जांच, सबूत इकट्ठा करना और उन्हें वापस पाना, अनजान लोगों की पहचान करना और उनका पता लगाना, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सबूतों को ज़ब्त करना और फॉरेंसिक जांच, मोबाइल लोकेशन डेटा का वेरिफिकेशन, और गवाहों के बयान रिकॉर्ड करना जैसे पहलू शामिल हैं, जो सभी सीधे तौर पर पुलिस जांच के दायरे में आते हैं और शिकायत करने वाले या शिकायत प्रक्रिया के ज़रिए इन्हें असरदार तरीके से नहीं किया जा सकता। आरोपों की प्रकृति और रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री को देखते हुए मौजूदा मामला ऐसा नहीं है जिसमें शिकायतकर्ता को प्राइवेट शिकायत करने के लिए छोड़ा जा सके।

गंभीर यौन शोषण, अज्ञात आरोपी व्यक्तियों और फोरेंसिक ज़रूरतों के आरोपों वाले मामले में पीड़ितों या शिकायतकर्ता को खुद सबूत इकट्ठा करने के लिए छोड़ना, पॉक्सो एक्ट के मकसद और भावना और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की योजना के खिलाफ होगा। इसलिए यह अदालत इस बात से सहमत है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के सेक्शन 173(4) के तहत इस प्रार्थना पत्र को मंज़ूरी दी जानी चाहिए। इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय दिए बिना प्रार्थना पत्र स्वीकार कर लिया।

आदेश में और क्या है

विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट विनोद कुमार चौरसिया ने आशुतोष ब्रह्मचारी के प्रार्थना पत्र पर सुनवाई के बाद अपने आदेश में कहा कि पीड़ित ए व पीड़ित बी के बयान, स्वतंत्र गवाहों के बयान और प्रयागराज के एडिशनल पुलिस कमिश्नर की जांच रिपोर्ट को ध्यान से और पूरी तरह से देखने पर यह पता चलता है कि आरोपियों पर पीड़ित ए व पीड़ित बी के साथ ही दूसरों से यौन शोषण के गंभीर आरोप हैं।

अदालत ने कहा कि यह बताया गया है कि आरोप पॉक्सो एक्ट 2012 और भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत सज़ा वाले संज्ञेय अपराधों से जुड़े हैं। यह भी पता चला है कि पीड़ितों और दूसरे गवाहों के बयान रिकॉर्ड करने के साथ सबूत इकट्ठा करने और उन्हें रिकवर करने की ज़रूरत पड़ सकती है।

इसके साथ ही यह भी लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और दूसरे फोरेंसिक सबूत अगर कोई हों तो उन्हें इकट्ठा करने और उनकी जांच करने की ज़रूरत पड़ सकती है, और ऐसे सबूतों के असली होने का वेरिफिकेशन कानून के मुताबिक फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी से कराना पड़ सकता है।

प्रार्थना पत्र में उल्लिखित लोगों के अलावा दो से तीन अनजान लोग भी इस घटना में शामिल बताए गए हैं और उनकी पहचान व भूमिका की जांच की ज़रूरत बताई गई है। इसके अलावा झूंसी थाना प्रभारी व प्रयागराज के पुलिस कमिश्नर को दी गई अर्जी से यह भी पता चलता है कि उसमें गंभीर संज्ञेय अपराधों का खुलासा होने का आरोप था। हालांकि आवेदक का आरोप है कि न तो थाना प्रभारी ने एफआईआर दर्ज की और न ही पुलिस कमिश्नर ने इस मामले में एफआईआर दर्ज करने के लिए कोई निर्देश दिया।

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