राज्य ब्यूरो, लखनऊ। लोकसभा चुनाव में पीडीए रणनीति के प्रभाव के बाद भाजपा अब बेहद सतर्क नजर आ रही है। लंबे समय बाद संगठनात्मक फेरबदल की प्...
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राज्य ब्यूरो, लखनऊ। लोकसभा चुनाव में पीडीए रणनीति के प्रभाव के बाद भाजपा अब बेहद सतर्क नजर आ रही है। लंबे समय बाद संगठनात्मक फेरबदल की प्रक्रिया शुरू करते हुए पार्टी की नजर विपक्ष, खासकर अखिलेश यादव और उनकी रणनीति पर टिकी हुई है।

20 फरवरी से पहले 14 जिलाध्यक्षों की घोषणा
सूत्रों के मुताबिक, 20 फरवरी से पहले 14 जिलाध्यक्षों के नाम घोषित किए जाएंगे। पार्टी की योजना है कि सभी 98 संगठनात्मक जिलों में एक साथ पूरी टीम का गठन किया जाए। इसके लिए जिलों में पर्यवेक्षक भेजे जाएंगे, ताकि जमीनी फीडबैक के आधार पर संतुलित टीम तैयार की जा सके। यदि पर्यवेक्षक नियुक्ति में देरी होती है, तो जिला प्रभारियों से इनपुट लेकर प्रदेश इकाई सीधे टीम घोषित कर सकती है।
जातीय समीकरणों को साधने की कवायद
भाजपा पीडीए की रणनीति की काट के रूप में जिलों में जातीय समीकरणों को नए सिरे से साधने की तैयारी में है।
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प्रयागराज मंडल में निषाद, यादव और मल्लाह
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सैनी, पाल और प्रजापति
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पूर्वांचल में यादव और कुशवाहा
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काशी क्षेत्र में मौर्य
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अवध में कुर्मी और पासी
इन वर्गों से नए चेहरों को संगठन में प्रमुख जिम्मेदारी मिल सकती है।
होली तक जिला संगठन और उसके बाद क्षेत्रीय टीम गठन की चर्चा है। पार्टी लंबे समय से इन समीकरणों पर मंथन कर रही है।
सपा की रणनीति पर नजर
भाजपा का आकलन है कि 2027 विधानसभा चुनाव में सपा सवर्ण और ओबीसी जातियों को अधिक टिकट दे सकती है। इसकी काट के तौर पर भाजपा कई जिलों में यादव नेताओं को संगठन में प्रमुख पद दे सकती है।
लोध और अन्य ओबीसी वर्गों पर फोकस
महोबा के विधायक बृजभूषण राजपूत और कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह के बीच विवाद के बाद लखनऊ में बड़े लोध नेताओं की बैठक ने सियासी हलचल बढ़ा दी। ब्रज क्षेत्र में लोध मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए उन्हें संगठन में प्राथमिकता मिल सकती है।
प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के रूप में कुर्मी प्रतिनिधित्व पहले से संतुलित माना जा रहा है, ऐसे में अन्य ओबीसी जातियों की दावेदारी भी मजबूत होगी।
ब्राह्मण और दलित वोटबैंक पर नजर
कुशीनगर के विधायक पीएन पाठक के आवास पर ब्राह्मण विधायकों की बैठक के बाद सियासी सरगर्मी बढ़ी थी। बसपा और सपा भी ब्राह्मणों को साधने में जुटी हैं, लेकिन भाजपा अपने पारंपरिक वोटबैंक को मजबूत रखने की रणनीति पर काम कर रही है।
वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती की सक्रियता को देखते हुए भाजपा दलित समीकरण को साधने की कोशिश तेज कर सकती है। प्रदेश अनुसूचित मोर्चा दलित महापुरुषों के नामों का कैलेंडर तैयार कर रहा है।
संगठनात्मक बदलाव के जरिए भाजपा आगामी चुनावी चुनौतियों से निपटने के लिए नए सामाजिक संतुलन का संदेश देने की तैयारी में है।
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