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नेपाल को दिया जाना वाला पैसा 'दान' नहीं 'जलवायु कर्ज' है- ग्रेटा थुनबर्ग

  काठमांडू । डेस्क: नेपाल में भीषण ग्लेशियर टूटने और उसके बाद आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है, जिसमें मरने वालों का आंकड़ा 1,...

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काठमांडू । डेस्क: नेपाल में भीषण ग्लेशियर टूटने और उसके बाद आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है, जिसमें मरने वालों का आंकड़ा 1,300 के पार पहुंच गया है और हजारों लोग अब भी लापता हैं. इस भीषण प्राकृतिक त्रासदी के बीच अंतरराष्ट्रीय जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थुनबर्ग नेपाल सरकार की 'जलवायु मुआवजे' (क्लाइमेट कंपनसेशन) की मांग के समर्थन में उतर आई हैं. थुनबर्ग ने साफ शब्दों में कहा है कि नेपाल को दिया जाने वाला पैसा कोई 'दान' या 'उदारता' नहीं है, बल्कि यह उन अमीर देशों और जीवाश्म ईंधन कंपनियों पर बकाया 'जलवायु कर्ज' (क्लाइमेट डेट) है, जिन्होंने वैश्विक तापमान बढ़ाकर इस तबाही की नींव रखी.


इसे प्राकृतिक आपदा न कहें, यह अमीर देशों का बढ़ाया संकट: ग्रेटा थुनबर्ग


सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक वीडियो जारी करते हुए थुनबर्ग ने हिमालयी क्षेत्र में हुई इस त्रासदी को महज एक प्राकृतिक हादसा मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि इसे दान या मदद कहना बंद होना चाहिए. यह एक ऐसा नुकसान है जो धनी राष्ट्रों और जीवाश्म ईंधन बेचने वाली बड़ी कंपनियों के अत्यधिक उत्सर्जन के कारण हुआ है. ग्रेटा ने वैश्विक मंचों पर नेपाल जैसे प्रभावित देशों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल न किए जाने पर भी सवाल उठाया और कहा कि जलवायु सम्मेलनों में नेपाल जैसे देशों को सिर्फ केस स्टडी की तरह पेश किया जाता है, जबकि उन्हें उन कमरों में मुख्य आवाज बनना चाहिए जहां नीतियां और फैसले तय होते हैं.


नेपाल का रुख: दान नहीं, जलवायु न्याय की मांग


ग्रेटा का यह बयान नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल के उस हालिया बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने इस मानवीय आपदा को दान की बजाय जलवायु न्याय के नजरिए से देखने की बात कही थी. खनाल ने स्पष्ट किया था कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में नेपाल का योगदान नगण्य होने के बावजूद उसे जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. हालांकि, बाद में अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक बयानों पर सफाई देते हुए उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि काठमांडू ने सीधे तौर पर किसी एक देश से औपचारिक मुआवजा नहीं मांगा है, बल्कि इसे वैश्विक मंचों पर एक बड़े मुद्दे के रूप में उठाया जा रहा है.


संयुक्त राष्ट्र महासभा में गूंजेगा मुद्दा, पीएम बालेन्द्र शाह उठाएंगे आवाज


इस भीषण त्रासदी के बाद अब नेपाल सरकार वैश्विक मंचों पर आधिकारिक रूप से इस मुद्दे को उठाने की तैयारी कर चुकी है. नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करने के लिए अमेरिका जाने वाले हैं. माना जा रहा है कि पीएम शाह संयुक्त राष्ट्र के मंच से जलवायु परिवर्तन के कारण नेपाल को हुए नुकसान का मुद्दा प्रमुखता से उठाएंगे और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जलवायु मुआवजे की मांग करेंगे. नेपाल सरकार पहले ही अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों को एक औपचारिक 'जलवायु मुआवजा दावा पत्र' भेज चुकी है, जिससे यह साफ है कि देश अब इस आपदा के लिए जिम्मेदारी और मुआवजे के अपने अधिकार को लेकर वैश्विक स्तर पर मजबूती से खड़ा है.


ग्रेटा थुनबर्ग कौन है


ग्रेटा थुनबर्ग स्वीडन की एक विश्व प्रसिद्ध पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता हैं, जिनका जन्म 3 जनवरी 2003 को स्टॉकहोम में हुआ था. वह मुख्य रूप से वैश्विक तापमान वृद्धि (ग्लोबल वॉर्मिंग) और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाने और दुनिया भर के नेताओं को इस मुद्दे पर तत्काल कार्रवाई करने के लिए दबाव बनाने के काम से जुड़ी हैं. ग्रेटा मात्र 15 साल की उम्र में वर्ष 2018 में तब सुर्खियों में आईं, जब उन्होंने स्वीडिश संसद के बाहर अकेले बैठकर प्रदर्शन करना शुरू किया था. हाथ में "स्कॉलस्ट्रेजक फॉर क्लाइमेट" (जलवायु के लिए स्कूल की हड़ताल) का पोस्टर लेकर किया गया उनका यह अनूठा विरोध प्रदर्शन जल्द ही एक वैश्विक जन आंदोलन में बदल गया, जिसे 'फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर' नाम दिया गया. 


इस आंदोलन के तहत दुनिया भर के लाखों स्कूली छात्रों ने जलवायु सुरक्षा की मांग को लेकर शुक्रवार को कक्षाओं का बहिष्कार करना शुरू कर दिया. ग्रेटा अपने बेबाक, सीधे और निडर बयानों के लिए जानी जाती हैं, जिसमें उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) जलवायु सम्मेलनों में विश्व नेताओं को जलवायु संकट पर ढुलमुल रवैया अपनाने के लिए कड़े शब्दों में फटकार लगाई थी. वर्ष 2019 में संयुक्त राष्ट्र के मंच से दिया गया उनका ऐतिहासिक बयान "हाउ डेयर यू!" (आपकी हिम्मत कैसे हुई!) दुनिया भर में काफी चर्चित हुआ था. 


उनकी इसी बेबाकी, नेतृत्व क्षमता और जलवायु न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के कारण उन्हें टाइम पत्रिका द्वारा वर्ष 2019 में 'पर्सन ऑफ द ईयर' चुना गया था, और वह यह सम्मान पाने वाली सबसे कम उम्र की व्यक्ति बनीं. इसके अलावा उन्हें एम्नेस्टी इंटरनेशनल के 'एम्बेसेडर ऑफ कंसाइंस' पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है और उन्हें बार-बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया है. आज वह दुनिया भर के युवाओं के लिए पर्यावरण संरक्षण की सबसे प्रमुख प्रतीक और प्रेरणा बन चुकी हैं.

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