बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक कांस्टेबल की सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को बरकर...
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के एक कांस्टेबल की सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी है. याचिकाकर्ता जवान स्वीकृत छुट्टी समाप्त होने के बाद भी छह महीने से अधिक समय तक बिना किसी ठोस कारण के ड्यूटी से गायब रहा था और बार-बार निर्देश दिए जाने के बाद भी काम पर नहीं लौटा.
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुशासित बल का कोई भी सदस्य 'अमान्य या तुच्छ' आधार पर अपनी सेवा से दूर नहीं रह सकता. अदालत ने टिप्पणी की कि सशस्त्र बलों को जिस प्रकृति के कार्य सौंपे जाते हैं, उसे देखते हुए ऐसी लापरवाही पर किसी भी प्रकार की दया दिखाना बल के समग्र अनुशासन और कामकाज को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को सेवा से हटाने का फैसला बिल्कुल उचित है और यह किसी भी स्थिति में अत्यधिक या असंगत नहीं है.
क्या है पूरा मामला
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, 34 वर्षीय याचिकाकर्ता वर्ष 2009 में सीआरपीएफ में कांस्टेबल के पद पर भर्ती हुआ था. लगभग आठ वर्षों की सेवा पूरी करने के बाद उसे स्थाई कर्मचारी का दर्जा मिला. फरवरी 2017 में उसे एक महीने (13 फरवरी से 14 मार्च 2017) की चिकित्सीय छुट्टी मंजूर की गई थी. इसके बाद उसने अपनी बीमारी-एनीमिया, नॉन-इकटेरिक हेपेटाइटिस और एंटरिक फीवर का हवाला देते हुए अगले छह महीने के अतिरिक्त अवकाश की मांग की और इसके समर्थन में मेडिकल सर्टिफिकेट प्रस्तुत किए.
हालाँकि, सीआरपीएफ अधिकारियों ने उसके द्वारा दिए गए मेडिकल दस्तावेजों को संदिग्ध माना, क्योंकि वे स्वीकृत छुट्टी के आखिरी दिन बनवाए गए थे और उनमें एक साथ छह महीने के पूर्ण विश्राम की सिफारिश की गई थी. अधिकारियों ने अप्रैल 2017 में उसकी अतिरिक्त छुट्टी की अर्जी खारिज कर दी और उसे तत्काल ड्यूटी पर रिपोर्ट करने या नागपुर स्थित सीआरपीएफ अस्पताल में इलाज कराने का निर्देश दिया.
कानूनी नोटिस और भगोड़ा घोषित होना
अधिकारियों द्वारा बार-बार पत्र भेजने और कड़े निर्देश दिए जाने के बावजूद याचिकाकर्ता न तो ड्यूटी पर लौटा और न ही बल के अस्पताल में उपस्थित हुआ. इसके चलते अधिकारियों ने उसे अनधिकृत रूप से अनुपस्थित माना और उसके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू कर दी. स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि जवान को 'भगोड़ा' घोषित कर दिया गया और उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी हुआ.
इसके बावजूद वह विभागीय जांच में शामिल नहीं हुआ. अंततः जून 2018 में सीआरपीएफ अधिकारियों ने कड़ी कार्रवाई करते हुए उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया. जवान ने इस निर्णय के खिलाफ अपील की, जिसे 2019 में खारिज कर दिया गया. इसके बाद उसने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया.
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता के वकील विवेक कुमार अग्रवाल ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को अपनी बात रखने का उचित अवसर दिए बिना ही जांच रिपोर्ट और बर्खास्तगी का अंतिम आदेश पारित कर दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है.
वहीं सीआरपीएफ की ओर से पैरवी कर रही केंद्र वकील अनमोल शर्मा ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता छुट्टी खत्म होने के बाद भी काम पर नहीं लौटा और उसे विभागीय जांच में भाग लेने के कई अवसर दिए गए थे. उन्होंने कहा कि जवान को बार-बार नोटिस भेजे गए, लेकिन उसने न तो उनका कोई जवाब दिया और न ही अनुशासनात्मक कार्यवाही में शामिल हुआ.
हाईकोर्ट का अंतिम रुख और फैसला
दलीलों को सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को अपनी सफाई पेश करने का पर्याप्त अवसर दिया गया था, इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन का सवाल ही नहीं उठता. कोर्ट ने उल्लेख किया कि गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद भी याचिकाकर्ता का अनुपस्थित रहना उसकी अपने कर्तव्यों और वरिष्ठ अधिकारियों के वैध निर्देशों के प्रति पूरी तरह से लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है.
अदालत ने अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि सशस्त्र बलों में इस प्रकार का आचरण स्वीकार्य नहीं है और सीआरपीएफ द्वारा उसे सेवा से हटाने का फैसला पूर्णतः न्यायसंगत है.
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