भुवनेश्वर । डेस्क: ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच लंबे समय से चले आ रहे महानदी जल बंटवारे के विवाद को सुलझाने के लिए 1 अक्टूबर को केंद्रीय गृह...
भुवनेश्वर । डेस्क: ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच लंबे समय से चले आ रहे महानदी जल बंटवारे के विवाद को सुलझाने के लिए 1 अक्टूबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की जाएगी. इस बैठक में दोनों पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्री एक साथ बैठकर एक सौहार्दपूर्ण और टिकाऊ समाधान निकालने का प्रयास करेंगे.
ओडिशा के एडवोकेट जनरल पीतांबर आचार्य ने इस बैठक की पुष्टि करते हुए बताया कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है. केंद्रीय जल आयोग (CWC) की मध्यस्थता और तकनीकी सहायता से जल बंटवारे के एक व्यावहारिक फॉर्मूले को अंतिम रूप देने पर चर्चा जारी है.
उल्लेखनीय है कि महानदी के ऊपरी क्षेत्रों में छत्तीसगढ़ द्वारा किए गए निर्माण और जल विनियमन (water regulation) को लेकर दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से मतभेद और विवाद की स्थिति बनी हुई है. केंद्र सरकार की इस पहल से वर्षों पुराने इस अंतरराज्यीय जल विवाद का सर्वसम्मत समाधान निकलने की उम्मीद बढ़ गई है.
महानदी जल-विवाद क्या है?
महानदी जल विवाद मुख्य रूप से ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच महानदी के पानी के बंटवारे को लेकर एक पुराना अंतरराज्यीय सीमा विवाद है. इसकी शुरुआत तब हुई जब छत्तीसगढ़ ने महानदी के ऊपरी प्रवाह वाले क्षेत्रों में बैराज और बांधों का निर्माण शुरू किया.
ओडिशा का आरोप है कि छत्तीसगढ़ द्वारा पानी रोके जाने से गैर-मानसून सीजन में हीराकुंड बांध तक पहुंचने वाले पानी का प्रवाह काफी कम हो जाता है, जिससे राज्य में सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, मत्स्य पालन और बिजली उत्पादन पर बेहद बुरा असर पड़ता है.
वहीं दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ का तर्क है कि वह केवल अपने हिस्से के पानी का उपयोग कर रहा है और यह निर्माण कार्य राज्य के औद्योगिक व कृषि विकास के लिए जरूरी हैं.
इस विवाद को सुलझाने के लिए अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम के तहत केंद्र सरकार ने मार्च 2018 में 'महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण' (Mahanadi Water Disputes Tribunal) का गठन किया था.
हालांकि, कानूनी प्रक्रियाओं में लगने वाले लंबे समय और तकनीकी पेचीदगियों के कारण इसका कोई स्थाई हल नहीं निकल सका है.
वर्तमान में दोनों राज्यों के बीच सौहार्दपूर्ण माहौल में बातचीत के जरिए एक न्यायसंगत और टिकाऊ जल-बंटवारा फॉर्मूला तैयार करने की कोशिश की जा रही है, ताकि मानसून और गैर-मानसून दोनों मौसमों में दोनों राज्यों की जल जरूरतों को संतुलित किया जा सके.
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