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बस्तर दशहरा: दंतेश्वरी माई की डोली जगदलपुर रवाना

  दंतेवाड़ा । संवाददाता: प्रसिद्ध बस्तर दशहरा महोत्सव के दौरान रविवार को एक ओर जहां धार्मिक आस्था का उल्लास देखने को मिला, वहीं दूसरी ओर प्र...

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दंतेवाड़ा । संवाददाता: प्रसिद्ध बस्तर दशहरा महोत्सव के दौरान रविवार को एक ओर जहां धार्मिक आस्था का उल्लास देखने को मिला, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण तनाव की स्थिति निर्मित हो गई. जगदलपुर में परंपरा अनुसार आयोजित फूल रथ परिक्रमा के दौरान रथ का पहिया और मुख्य लकड़ी अचानक टूट गई. सुधार के तमाम प्रयासों के विफल होने पर जब प्रशासन ने जेसीबी मशीन की मदद से रथ को आगे बढ़ाने की कोशिश की, तो वहां मौजूद ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा. 

सीरहासार चौक पर ग्रामीणों और प्रशासन के बीच तीखी बहस हो गई. इस गहमागहमी के दौरान भीड़ के बीच ट्रैफिक डीएसपी अचानक गिर पड़े, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा.

दूसरी तरफ, करीब छह सौ सालों से चली आ रही इस ऐतिहासिक परंपरा के तहत मां दंतेश्वरी की पावन डोली और छत्र रविवार को अष्टमी के अवसर पर दंतेवाड़ा स्थित मंदिर से जगदलपुर के लिए रवाना कर दिए गए. जिया परिवार और पुजारियों ने भक्ति भाव के साथ डोली को अपने कांधों पर उठाया. 

डंकिनी पुल तक मां के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब उमड़ा रहा. डंकिनी पुल से विशेष वाहन के जरिए करीब 80 किलोमीटर का सफर तय कर यह पावन डोली सोमवार सुबह जगदलपुर के जिया डेरा पहुंचेगी, जहां इसका भव्य स्वागत किया जाएगा.

बस्तर दशहरा

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में आयोजित होने वाला विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा देश का सबसे अनोखा और लगभग 75 दिनों तक चलने वाला सबसे लंबा लोक पर्व है. सामान्यतः देश भर में मनाए जाने वाले विजयादशमी पर्व से यह पूरी तरह भिन्न है, क्योंकि इसमें न तो भगवान श्रीराम की कथा का संदर्भ होता है और न ही रावण के पुतले का दहन किया जाता है. 

यह पूरा उत्सव आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और स्थानीय जनजातीय लोक देवी-देवताओं की उपासना, शक्ति पूजा तथा प्रकृति-संस्कृति के समन्वय को समर्पित होता है.

इस ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत 15वीं शताब्दी (लगभग 1408 ईस्वी) में काकतीय वंश के राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा की गई थी. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा पुरुषोत्तम देव जब जगन्नाथ पुरी की तीर्थयात्रा से लौटे, तब उन्हें 'रथपति' की उपाधि प्राप्त हुई. 

वहां से लौटने के पश्चात् उन्होंने बस्तर में विशाल काष्ठ रथ चलाने और देवी मां की पूजा-अर्चना की यह परंपरा शुरू की, जो आज 600 से अधिक वर्षों से अनवरत चली आ रही है.

सावन माह की हरियाली अमावस्या पर 'पाट जात्रा' (रथ निर्माण की लकड़ी का पूजन) की रस्म से शुरू होकर यह पर्व आश्विन शुक्ल पक्ष की विभिन्न रस्मों जैसे काछनगादी, जोगी बिठाई, फूल रथ परिक्रमा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी और मुरिया दरबार से गुजरता हुआ समाप्त होता है. 

इस दौरान लगभग 80 परगनों से सैकड़ों ग्रामीण और जनजातीय प्रतिनिधि अपार श्रद्धा के साथ जगदलपुर एकत्र होते हैं, विशालकाय रथ को स्वयं कांधों और हाथों से खींचते हैं और बस्तर की अनूठी सामूहिक जन-सांस्कृतिक व्यवस्था का परिचय देते हैं.

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